हैं बुरे से दौर में तौबा फँसे हुए
सालों हुए हैं तौबा खुलकर हँसे हुए
हाथों को हाथ देकर बाहर निकालिए
कब तक रहेंगे तौबा खड्डे में धंसे हुए
किस से उम्मीद किज़िये सुनेगा हमे यहाँ
सबके सब पड़े है गुस्से में तपे हुए
ख़ुद में रहकर ख़ुदको मसीहा ना समझो
किसी रोज़ देखोगे ख़ुद को रास्ते पर पड़े हुए
अपनी अपनी छोड़कर अब सबकी सोचिए
कब तक रहेंगे दोनों “गुरु” कीचड़ में धंसे हुए
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