Sunday, 19 April 2026

ज़ख़्म हरा नहीं..

 ग़लत फ़हमी है की ज़ख़्म अब हरा नहीं 

37 बरस का हो गया, पर ज़ख़्म भरा नहीं 


मैंने तुम्हें ग़ैरों के गले मिलते देखा है 

शुक्र करो,किसी का गला कटा नहीं 


आपस में कई बरस छिप के दुख बाँटे तुमने

मुझसे न कोई मिला,मेरा दुख बँटा नहीं 


बद-दुआओं को सीने में दफ़्न रखा है मैंने 

ख़ुशी है , दोनों में से कोई मरा नहीं 


तेरे घर-गली मोहल्ले से मेरा रोज़ गुज़र रहा 

लिहाज़ रखा सबका,किसी से डरा नहीं 


तुम तो सबको झूठी कहानी बता साफ़ हो बैठी 

सच छिपा है मुझमें, जो किसी को पता नहीं


“गुरु “

Monday, 23 March 2026

वही भगत फिर चाहिए

 आँखो में अंगार वही,सीने में वही दहक फिर चाहिए 

वही सुखदेव,वही राजगुरु,वही भगत फिर चाहिए 


गौरों से पिछा छुड़ाया तो अपने ही छाती पर चढ़ बैठे 

अपने कालों को भी अब गौरों सा सबक फिर चाहिए

वही सुखदेव,वही राजगुरु,वही भगत फिर चाहिए 



शिष्टाचार की भाषा अब सबकी समझ से है परे 

वही कलम,वही बंदूक वही सनक फिर चाहिए 

वही सुखदेव,वही राजगुरु,वही भगत फिर चाहिए 


मूछों पर ताव अब तुमको सलामी है “गुरु “की 

तेरी-मेरी मेहनत का बराबर हक़ अब चाहिए 

वही सुखदेव,वही राजगुरु, वही भगत फिर चाहिए

Wednesday, 18 March 2026

तुम्हारे पास आ चुप-चाप लबों को चूमना था बस..।।

 

तेरी सोहबत मे बैठकर, जरा सा झूमना था बस

ले हाथ मे चाय, तुम्हारे साथ छत पर घूमना था बस

होती रात और तुम बगल मे मेरे चाँद बन सोते

तुम्हारे पास आ चुप-चाप लबों को चूमना था बस

 

ठंडी सी हवा चलती, होती रोशनी हल्की सी

बंद पलकें तुम्हारी मोटी-मोटी आँखों को ढके रखती

हो माथे-गाल से बालों की लट होंठों तलक उड़ती

उड़ते बालों को उंगलियों से झुमके के पीछे लपेटना था बस

तुम्हारे पास आ चुप-चाप लबों को चूमना था बस

 

करवट ले भी ली मैंने पर तुम्हारे फूले गाल नहीं भूला

कस्तूरी,चंदन भूल गया पर तुमसे उड़ता गुलाल नहीं भूला

सन्नाटे मे भी मुझको मेरी साँसे मानो शोर सुनाई दी

गहरी सांस लेकर मन ही मन तुम्हें सूंघना था बस

तुम्हारे पास आ चुप-चाप लबों को चूमना था बस

 

बिछड़ी भी तो ऐसी कि सपन तक मे दिखाई न दी

न मिले कभी गले,न साथ मे तस्वीर कभी कोई ली

बिछड़ने की खबर होती तो एक-एक ख्वाब मुकम्मल करते

अरसा ऐसा गुजरा की तुम्हारी आवाज तक न सुनाई दी

हो बेपरवाह भारी आँखों से तुमसे जी भरकर लिपटना था बस

तुम्हारे पास आ चुप-चाप लबों को चूमना था बस

 

 "गुरु"

 

Saturday, 7 March 2026

बाख़ुदा तुम्हारे सिवा इश्क़ , किसी से नहीं किया

 बाख़ुदा तुम्हारे सिवा इश्क़ , किसी से नहीं किया 

इतिहास रहेगा, जब तक जिया, तुम्हारा बनके जिया 


तुम्हारे साथ बैठकर जो की, बस वही बातें थीं

याद  में जगकर जो काटीं, बस वही रातें थीं।

किसी के साथ 'चाय' का ज़ायका नहीं चखा हमने

जबरन कप उठा भी लिया, तो मानो अहसान किया 

बाख़ुदा तुम्हारे सिवा इश्क़, किसी से नहीं किया।


हमने खेली थी जो संग तुम्हारे, बस वही होली और फाग था

उसके बाद से तो इस कलेजे में, जलता विरह का आग था।

तुम्हारे सिवा किसी और को रंगा नहीं, ना तब और ना अब

ज़रूरी हुआ तो रंग बस हथेली पर बे-जान सा धर दिया।

बाख़ुदा तुम्हारे सिवा इश्क़, किसी से नहीं किया।


हर शाम सूखी नज़रों से तुम्हारा इंतेज़ार करतें हैं 
अकेले बैठते हैं,आँखें बंद करके संगीत सुनते हैं 
दिन रात दोपहर सबमे बाँट दिए “गुरु” ने 
शाम का पहर तुम्हारा था,आज भी किसी के नाम नहीं किया 
बाख़ुदा तुम्हारे सिवा इश्क़ , किसी से नहीं किया

Friday, 10 October 2025

राम जाणे, के आगे आवै सै

बाबू ये काम जनाने पण के,मनै भी क़द भावै सै 

के पाप करे थे राम जाणे, के आगे आवै सै 


लत्ते धोण की खातर कद मेरा जी मानै सै 

कासण माँजदे होयाँ कै बीते,मेरा जी जाणे सै 

छाती ऊपर मेरे भी सौ साँप लोटणी खावै सै 

के पाप करे थे राम जाणे, के आगे आवै सै 


आटा गूँथणा ,रोट बनाने मने कद चाये थे 

थारी अर मेरी रोटी खातर खूब धक्के खाये थे 

हालत पै अपणी भी मनै रोणा सा आवै सै 

के पाप करे थे राम जाणे, के आगे आवै सै 


मैंने बेरा सै यू सब देखके तेरा भी जी दुखे सै 

माँ की भी भीतर ए भीतर आत्मा सी फूँके सै 

सोच के टैम काटूँ अक बख्त बुरा सबपै ए आवै सै 

के पाप करे थे राम जाणे, के आगे आवै सै 


समझूँ तो मैं भी सब सूँ,सारे सच जाणु सूँ 

रोल्या यो सै अक घर भीतर रोल्या ना चाहूँ सूँ 

ख़ुद जल ल्यूँ,मर ल्यूँ पर किसे तई कहण पै के हो जा सै 

के पाप करे थे राम जाणे, के आगे आवै सै 


मने कही थी बापू,मत ब्याह मनै ,मैं एकला मर-खप ल्यूंगा 

रहूँ जिस्या रह ल्यूँगा ,किसे नै दुख तो नहीं देऊँगा 

इब जीते जी यो लाल तेरा रोज़ चिता ज्यूँ बले जा सै 

के पाप करे थे राम जाणे, के आगे आवै सै 


मेरी सासू न्यूँ कर मनै चोखी तरियाँ बालक नुहाणे सिखादे 

कपड़े,भांडे,रोटी आगी, इब सब्ज़ी बनानी और सिखादे 

काल कोये न्यू ना कहदे अक लुगाई नै तड़पा है 

के पाप करे थे राम जाणे, के आगे आवै सै


रोटी-टूका खातर कद लग सरकार घर झुड़वावेगी 

सारे काम कराए इब के फाँसी तुड़वावेगी 

परिवार व्यपार समाज़ सारे क्यों एक ही पलड़े आवै सै 

के पाप करे थे राम जाणे, के आगे आवै सै

Sunday, 31 August 2025

तौबा फँसे हुए…

 हैं बुरे से दौर में तौबा फँसे हुए 

सालों हुए हैं तौबा खुलकर हँसे हुए 


हाथों को हाथ देकर बाहर निकालिए 

कब तक रहेंगे तौबा खड्डे में धंसे हुए 


किस से उम्मीद किज़िये सुनेगा हमे यहाँ

सबके सब पड़े है गुस्से में तपे हुए 


ख़ुद में रहकर ख़ुदको मसीहा ना समझो 

किसी रोज़ देखोगे ख़ुद को रास्ते पर पड़े हुए 


अपनी अपनी छोड़कर अब सबकी सोचिए  

कब तक रहेंगे दोनों “गुरु” कीचड़ में धंसे हुए 

Thursday, 26 June 2025

तुम्हारी याद आती है,,,,,

 बदलता है जब भी मौसम,तुम्हारी याद आती है 

धूप से शाम होती है ,तुम्हारी याद आती है 


ऐब दो पाल रखे हैं , एक तुम और एक तुम्हारे रंग की चाय 

चाय को समझकर जाम पीता हूँ ,तुम्हारी याद आती है 


जाकर बैठ गए तुम दूर,दिल के भेद कहूँ किस से 

आधी रात सताए याद तो बात करूँ किस से 

छाती रख सिरहाना जब आराम लेता हूँ,तुम्हारी याद आती है 


रात को सोए-सोए ही बिस्तर पे तुम्हें हाथों से ढूँढना 

जागकर नींद से तुमको तुम्हारी खैरियत पूछना 

आदत हो बुरी बेशक मगर दिल को लुभाती है

रात से भौर होती है,तुम्हारी याद आती है


मुकरर दिन से पहले मायके से लौट आओ तो ये मानू 

आते ही करो बंद दरवाजे,गले लग जाओ तो ये मानु 

जितनी मुझको आती है उतनी ही तुम्हें भी याद आती है 

तुम्हारी याद आती है,तुम्हारी याद आती है,,,,,,