आँखो में अंगार वही,सीने में वही दहक फिर चाहिए
वही सुखदेव,वही राजगुरु,वही भगत फिर चाहिए
गौरों से पिछा छुड़ाया तो अपने ही छाती पर चढ़ बैठे
अपने कालों को भी अब गौरों सा सबक फिर चाहिए
वही सुखदेव,वही राजगुरु,वही भगत फिर चाहिए
शिष्टाचार की भाषा अब सबकी समझ से है परे
वही कलम,वही बंदूक वही सनक फिर चाहिए
वही सुखदेव,वही राजगुरु,वही भगत फिर चाहिए
मूछों पर ताव अब तुमको सलामी है “गुरु “की
तेरी-मेरी मेहनत का बराबर हक़ अब चाहिए
वही सुखदेव,वही राजगुरु, वही भगत फिर चाहिए

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