Sunday, 19 April 2026

ज़ख़्म हरा नहीं..

 ग़लत फ़हमी है की ज़ख़्म अब हरा नहीं 

37 बरस का हो गया, पर ज़ख़्म भरा नहीं 


मैंने तुम्हें ग़ैरों के गले मिलते देखा है 

शुक्र करो,किसी का गला कटा नहीं 


आपस में कई बरस छिप के दुख बाँटे तुमने

मुझसे न कोई मिला,मेरा दुख बँटा नहीं 


बद-दुआओं को सीने में दफ़्न रखा है मैंने 

ख़ुशी है , दोनों में से कोई मरा नहीं 


तेरे घर-गली मोहल्ले से मेरा रोज़ गुज़र रहा 

लिहाज़ रखा सबका,किसी से डरा नहीं 


तुम तो सबको झूठी कहानी बता साफ़ हो बैठी 

सच छिपा है मुझमें, जो किसी को पता नहीं


“गुरु “

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