Saturday, 27 June 2026

आँखों ही आँखों में ..

 चाय की प्याली हाथों में ले, मुंडेर पर रुक जाता हूँ मैं,

आँखों ही आँखों में अक्सर, तेरी छत तक आ जाता हूँ मैं।


बंद आँखों से भी तुझको, उस छत पर हँसते देखता हूँ,

मानो नयन मिले हों तुमसे, यूँ ही मुस्कान बिखेरता हूँ।

यादों के कुछ गीत चलाकर, संग तुम्हारे गुनगुनाता हूँ मैं


आँखों ही आँखों में अक्सर, तेरी छत तक आ जाता हूँ मैं।


जब ढलती है शाम शहर में, और आसमां में चाँद आता है,

तेरी छत का वो सूनापन, मेरी धड़कन को महका जाता है।

हवा के हर एक झोंके में, तेरी आहट सुन मुस्काता हूँ मैं


आँखों ही आँखों में अक्सर, तेरी छत तक आ जाता हूँ मैं।


सालों बीते बिछड़े हमसे, पर अब भी तुमसे खूब बनती है,

इस एकतरफा मोहब्बत की, यारा अपनी ही मर्ज़ी चलती है।

तन्हा होकर भी 'गुरु' हर पल, तेरा साथ निभाता हूँ मैं,


आँखों ही आँखों में अक्सर, तेरी छत तक आ जाता हूँ मैं।