रंगों का त्योहार है क्या तुम भी मनाओगे........
बेरंग मेरी जिंदगी में क्या रंग बन मिल जाओगे......
एक रंग उम्मीद का लगाना.....
जो मैं तुमसे कोई वादा करूँ...
तुम भी वो वादा निभाना.....
गर वादा किया तो फिर अच्छे से निभाओगे......
रंगों का त्योहार है क्या तुम भी मनाओगे........
एक रंग ख्वाबों का भी लगाना....
मेरे पास आना और हल्का सा मुस्कुराना.....
आंखों से आँखें मिलाकर सपनों का महल सजाओगे....
रंगों का त्योहार है क्या तुम भी मनाओगे........
एक रंग हिम्मत का भी लगाना ...
मैं साथ खड़ा रहा तो कंधे से कंधा मिलाना......
दुनिया के दो- टूक सवालों का जवाब दे पाओगे....
रंगों का त्योहार है क्या तुम भी मनाओगे........
सब रंग मिल जाये तो और इश्क का रंग बन जाये .....
तो ये रंग मुझको जितना हो सके लगाना......
इस इश्क के रंग में .....फिर तुम भी रंग जाओगे
रंगों का त्योहार है क्या तुम भी मनाओगे........
Wednesday, 16 March 2022
रंगों का त्योहार है क्या तुम भी मनाओगे........(rango ka tyohar hai kya tum bhi manaoge)
Tuesday, 15 March 2022
मुझे जीना नही आता, मुझे मरना नही आता….(mujhe jeena nahi aata..mujhe marna nahi aata)…a poem by “guru”
मुझे जीना नहीं आता,मुझे मरना नही आता
सिवा तुम्हें याद करने के मुझे कुछ करना नहीं आता
मुझे हँसना नहीं आता,मुझे रोना नही आता
एक तुम्हें छोड़कर, मुझे किसी और का होना नही आता
मुझे चलना नही आता,मुझे रुकना नही आता
अगर तुम साथ ना हो तो गिरकर उठना नही आता
मुझे लिखना नही आता,मुझे बिकना नही आता
मैं टूटकर रोऊँ,सिवा तेरे किसी ओर को दिखना नही चाहता
“गुरू” को खुद अपनी लिखी बात को पढ़ना नही आता
मैं तुम्हें पा नही सकता और खोना भी नही चाहता
“गुरू”
Monday, 14 March 2022
नादान परिंदे बड़े हो गए….(nadan parinde bade ho gaye)… a poem by “guru”
नादान परिंदे बड़े हो गए
पैरों पर अपने खड़े हो गए
साथ दिया जिनका आसमान बनकर हमने
आज पंख उनके,हम ही से बड़े हो गए
मैंने चाहा कि वो अपनी क़ाबिलियत पहचान ले
दौड़ाया घोड़े सा उनको,और हम लँगड़े हो गए
वो उड़े ऐसे,की दूरियों का अहसास करवाकर ही माने
जो दरारें हम भरने चले थे वही खड्डे हो गए
नई उड़ान का चस्का इतना कि अकेले उड़ने लगे
ऊँचा इतना उड़े कि सारे रिश्ते छोटे हो गए
“गुरु” ऐसा ही रहा,हालत भले बद्द से बद्दतर हो गए
समझाने लगे तो हम भी दुश्मन हो गए
सब जगह बस तुम ही तुम ..(sab jagah bus tum hi tum) a poem by “guru”
बाहर तुम,भीतर तुम,हर जगह बस तुम ही तुम
मुझमें भी मैं हूँ कहाँ, मुझमे भी बस तुम ही तुम..
धूप तुम,तुम छाँव हो,दर्पण भी तुम,तुम्ही अक्स हो
हो तुम्ही पत्ते,फूल,फल,लहलहाता दरख्त तुम...
शौंक तुम,आदत भी तुम,आदि-अनादि अनन्त तुम
बारिश तुम,पतझड़ भी तुम,जिंदगी के बसन्त तुम
सूरज भी तुम,तुम चाँद हो,तारा भी तुम,गुलाब तुम
ज़ाम तुम,भगवान तुम,तुम सुबह और शाम तुम
तुम भी तुम,"गुरू" भी तुम,सृष्टि सकल कायनात तुम
ज़ज़्बात तुम,हालात तुम ख्वाब तुम मेरे दिल की बात तुम
"गुरू”
Friday, 11 March 2022
बस तुम मेरे साथ हो ..bus tum mere sath ho “poem by guru”
चार बरस की सजा मुझे हो या आजीवन कारावास हो
बस तुम मेरे साथ हो मुझे इतना सा विशवास हो
रस्सी आवत जात तै सिल पर पड़े निशान
सील बने दुनिया सारी, मेरा रस्सी सा प्रयास हो
टूट-टूट के बिखरुं चाहे,उम्मीद है फिर जुड़ जाऊंगा
पानी जैसा हो धैर्य मुझमे,अग्नि जैसा अट्टहास हो
मुझसे किये वायदे सारे, मुझे भूल तुम्हे निभाने होंगे
धरती-पाताल चाहे जहाँ रहूँ, तुम्हारे हंसने का आभास हो
बस तुम मेरे साथ हो,मुझे इतना सा विशवास हो.......
“गुरु”
Tuesday, 8 March 2022
माया ......MAYA a poem by "guru"
माया
ऊपर से निचे तक सारे आबंध खोलकर
Monday, 7 March 2022
यकीं कीजिये...(Yakin kijiye...)
यकीं कीजिये
आसां नही है...आंसू रोक पाना...यकीं कीजिये
आसां नही...तुमसे दिल लगाना...यकीं कीजियेयकीं है हृदय को,मेरे बुलावे पर आए हो
सताया है छः माह,मनाने अब आये हो
आसां नही है...तुमसे रूठ पाना...यकीं कीजिये...
मैं भागा बहुत,दीद भर को तेरी
तेरी आँख-मिचौली,भीगी पलकें मेरी
आसां नही है...भीगी पलकें सुखाना...यकीं कीजिये
प्रेम तुमसे प्रिय,प्रसंग तुम ही रचो
घर आये हो सजन ,एक बार तो दिखो
आसां नही है...तुम्हे देखे बिन जी पाना...यकीं कीजिये
बिन सजनिया देखो,मैं बिरहा सह रहा हूँ
प्रेम मन मे समेटे,तुम्हे देखे बिन रह रहा हूँ
आसां नही है... "गुरुचरण" प्रेम निभाना...यकीं कीजिये
आसां नही है...तुमसे दिल लगाना...यकीं कीजिये
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हम उनके दोगलेपन के बारे में क्या जान गए वो तो बुरा ही मान गए पीठ पीछे करते रहे ,मारने की साज़िश सामने देखा तो हमारी लंबी उम्र पर क़ुर्बान ...
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बदलता है जब भी मौसम,तुम्हारी याद आती है धूप से शाम होती है ,तुम्हारी याद आती है ऐब दो पाल रखे हैं , एक तुम और एक तुम्हारे रंग की चाय चा...
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ओह,,,, तुम हो,,,,, जो जिम्मेदारी से सारा परिवार सम्भालती हो सबसे पहले जगकर घर-बार सम्भालती हो ओह----तो तुम हो अपने हाथों की चाय से सबके दि...
