Monday, 9 January 2023

Mujhe fir se chaho mat…. मुझे फिर से चाहो मत Apoorn by guroo


 उलझी-उलझी सी ज़िंदगी,और उलझाओ मत

झूठे मन से मोह लगाके,मुझे फिर से चाहो मत


नेह लगाके प्रियतम तुमसे,झूठी “हाँ” को “हाँ”माना

बनके गुलाबी डोर सखी,पतंग सा उड़ाओ मत

झूठे मन से मोह लगाके,मुझे फिर से चाहो मत


तन बाँटा कइयों में,मन तक में आज कोई और सखी

“अब भी मेरी हो” बोल-बोलकर,मुझे चिढ़ाओ मत 

झूठे मन से मोह लगाके,मुझे फिर से चाहो मत


तन सबका,मन उसका, धन-धन “गुरु” से कहना क्या

मुश्किल से तो दूर किया है,फिर से दिल में समाओ मत

झूठे मन से मोह लगाके,मुझे फिर से चाहो मत


गुरु

Thursday, 22 December 2022

तुम…..Tum….a poem by “guroo “


 शुरू-शुरू में मेरे साथ इतनी ज़ज़्बाती थी तुम…

मैं जैसा कहता था,वैसी हो जाती थी तुम…


दूसरों से मेरी बुराई कर रही हो तो पहले ख़ुद से पूछना 

मुझे अच्छे से जानती हो,या यूँ ही मन हल्का कर रही हो तुम…


किसी और की होकर दोबारा मेरी तरफ़ मत आना 

बार-बार किसी और की होकर,अब मेरी नहीं रही तुम…


तुमसे बात करने का दिल तो बहुत करता है मगर…

बातें रोक लेती हैं,जो दूसरों से मेरे बारे में किया करती हो तुम…


मुझे डर है कि तुमसे बात करके फिर से तुम्हारा ना हो जाये”गुरु”

दूसरों का होकर भी तुम्हारा रहूँ, धोखा देकर दूसरों की रहो तुम…..

Saturday, 10 December 2022

उसके दिल में थोड़ी सी जगह ली है मैंने….uske dil me thodi si jagah li hai maine ….a poem by “Guroo”

पल दो पल ही सही,मगर उसे ख़ुशी दी है मैंने

उसके दिल में थोड़ी सही,मगर जगह ली है मैंने


देख जो मुझको हँसे,उन खिलखिलाते होठों की क़सम

मुझसे लिपटकर रोने वाले उन हाथों की क़सम 

हद्द से बढ़कर उस से मोहब्बत की है मैंने 

उसके दिल में थोड़ी सही,मगर जगह ली है मैंने


राहों में मिलना उस से,उसकी नज़रों का शर्मसार हो झुक जाना

होठों पे गाली,डर चेहरे पर,दिल ही दिल मुस्कुराना

जिस्म से लेकर रूह तक जगह ली है मैंने 

उसके दिल में थोड़ी सही,मगर जगह ली है मैंने


मेरी आँखों में रहने वाले,मुझसे नज़रें छिपाते चलते हैं

मैंने एक महबूब नहीं बदला,वो हर रोज़ बदलते है 

“गुरू” की मोहब्बत खोटी भले,पर हर बार खरी सलाह दी है मैंने

उसके दिल में थोड़ी सही,मगर जगह ली है मैंने


“गुरू”

पहले सा प्यार नहीं करता…pehle sa pyar nahi karta….a poem by “Guroo”

 



रातों की नींद में ख़ुद को बेक़रार नहीं करता

दिन के उजाले में मेरा इंतज़ार नहीं करता

मेरा महबूब मुझे पहले सा प्यार नहीं करता


पहले की तरह शाम को छत पर मुझसे नहीं आता 

न इशारे करता,न नाराज़ होकर ग़ुस्से में आँखें दिखाता

मुझसे मिलने के लिए अब सोलह शृंगार नहीं करता 

मेरा महबूब मुझे पहले सा प्यार नहीं करता


उसकी ज़िंदगी में था,अब ख़्वाबो तक में आता ही नहीं

पूछने को मेरी तबीयत अब वो हाथ उठाता ही नहीं

मेरा होकर भी वो मुझपर नहीं मरता

मेरा महबूब मुझे पहले सा प्यार नहीं करता



वो कभी मुझे देखने के लिए मेरी गली के चक्कर काटता था

धोखा देकर मेरा प्यार,ग़ैरों के दामन में बाँटता था 

गिर गया नज़रों से जो कभी दिल में बैठा रहा करता

मेरा महबूब मुझे पहले सा प्यार नहीं करता…..


                                                      “गुरू”

Monday, 31 October 2022

एक उलझन है...सुलझा दो ना.....ek uljhan hai..suljha do na...a poem.by guru

 एक उलझन है........सुलझा दो ना

हम में क्या रिश्ता है..समझा दो ना...


क्यों तुम्हारा हर पल इंतजार रहता हैं

बात करने को दिल बेकरार रहता है

पीने वाले पिएं दिन रात गांजा, शराब 

मुझ पर तो तुम्हारा नशा सवार रहता है

ये कैसे उतरेगा...कोई तो दवा दो ना

उलझन है...सुलझा दो ना


प्यार भरे तानो से क्यों घायल करते हो

चौबीसों घंटे दिल पर क्यों छाए रहते हो

दिल जिस्म नशा याद सपने तक तेरे 

फिर भी कहो; क्यूं बन के पराए रहते हो 

राज को राज कब तक रखें... छपवा दो ना

उलझन है...सुलझा दो ना...


रोज के कामों में जीना दुश्वार रहता है 

तेरे इश्क में दिल ये बीमार रहता है

यूं तो आलस से भरा रहता है बदन बावरा

पर तुम जब भी पुकारो,"गुरू"तैयार रहता है 

खूबसूरत बहुत हुं... वहम मिटा दो ना

उलझन है...सुलझा दो ना...

Thursday, 20 October 2022

ज़रूरी था ….Zaruri tha….a poem from “Guroo”

 मेरे ही संग खट्टे-मीठे ख़्वाब का बुनना ज़रूरी था 

भीड़ भरी दुनिया में,क्या मुझे ही चुनना ज़रूरी था 


ग़र ज़हर थी तुम तो ज़हर सा बनकर ही रहती 

मिश्री सा मीठा बनकर,क्या मुझमें घुलना ज़रूरी था


मैंने सालों तक ख़ुद को परखा है,तुझे भूलना नामुंकिन है 

ख़ुद को परखने के लिए,इस राज़ का खुलना ज़रूरी था


तेरे महँगे फ़ोन की ब्लॉकलिस्ट में नंबर मेरा सेव पड़ा है 

दूसरों से तेरी रिकॉर्डिंग माँगे,आवाज़ सुनना ज़रूरी था 


राह अलग-चाह अलग,जब अलग-अलग जीना मरना

लाख सितम के बाद तेरा ,क्या छत पे दिखना ज़रूरी था


“गुरु” ने साँचा बनकर के,क़ीमती हीरे सा सँभाला सदा तुम्हें 

चोरी छिपकर ,बाज़ारू बनकर बिकना क्या ज़रूरी था


                                                                               “गुरु”

Sunday, 16 October 2022

अब उसका रहना नहीं चाहता…ab uska rehna nahi chahta..a poem by guru

 

www.guruchk.blogspot.com


 सालों से उसे भूलना चाहता हूँ ,लेकिन भुला नहीं पता

वो जितना समझती है,उतना भी उसका रहना नहीं चाहता 


उसे भूलने में मुझे अब बस इतनी सी दिक्क्त बची है दोस्तों

उसे भूलूँ तो उसके बदले में कोई भी याद नहीं आता 

वो जितना समझती है,उतना भी उसका रहना नहीं चाहता 


वो दौर और था कि,उसका दीवाना बना घूमता था मैं

अब वो घर आकर भी मिले,तो मैं मिलना नहीं चाहता 

वो जितना समझती है,उतना भी उसका रहना नहीं चाहता


मुझे याद है कि हर पल में “गुरु”सिर्फ़ और सिर्फ़ उसी का था

अब टुकड़ों में भी बँट जाऊँ,तो उसके हिस्से आना नहीं चाहता

वो जितना समझती है,उतना भी उसका रहना नहीं चाहता


“गुरु”