Tuesday, 8 March 2022

माया ......MAYA a poem by "guru"

                                                          माया


ऊपर से निचे तक सारे आबंध खोलकर

भीतर तक देख ली माया,अच्छे से टटोलकर
सन्तों के लाख वचन भी समझा नहीं पाये
कदमो को थाम बैठे तुम,माया के एक बोल पर

रंग में भले चमक,मगर बंदर सी सुंदर है
माया महाठगनी है तो लगती बेहद खूबसूरत है
ये एक हाथ,एक दिल में,नही बस पाई कभी
पागल ना बन इसके लिए ना झोल-झाल कर

ये माया नहीं तेरी,ना होगी कभी उसकी
सब के सब लड़ के मर गए,राक्षसो की हुई ना ऋषि मुनि की
माया में दम है कितना,आकर के मुझसे पूछो
देखी है हमने ताकते,गलियो में इसका रस्ता रोक कर

नागीन सा फन उठाती है ये बात बात पर
लोगो को जगाती है ये रात रात भर
वाकिफ है"गुरु"भी इसके शब्दों  से भली भांति
देखा है इसको हमने तराजू में तोलकर

बच्चों से क्या उलझना,हमसे मोल भाव् कर
ताक में बैठे है  हम छाती के बटनों को खोलकर
कब तक यूँ ही लोगो को पागल बनाओगी
आकर "गुरु"से भी नजरें दो-चार कर....

                                                                "गुरु"

Monday, 7 March 2022

यकीं कीजिये...(Yakin kijiye...)

यकीं कीजिये

                               
यकीं कीजिये


आसां नही है...आंसू रोक पाना...यकीं कीजिये

आसां नही...तुमसे दिल लगाना...यकीं कीजिये

यकीं है हृदय को,मेरे बुलावे पर आए हो
सताया है छः माह,मनाने अब आये हो
आसां नही है...तुमसे रूठ पाना...यकीं कीजिये...

मैं भागा बहुत,दीद भर को तेरी
तेरी आँख-मिचौली,भीगी पलकें मेरी
आसां नही है...भीगी पलकें सुखाना...यकीं कीजिये

प्रेम तुमसे प्रिय,प्रसंग तुम ही रचो
घर आये हो सजन ,एक बार तो दिखो
आसां नही है...तुम्हे देखे बिन जी पाना...यकीं कीजिये

बिन सजनिया देखो,मैं बिरहा सह रहा हूँ
प्रेम मन मे समेटे,तुम्हे देखे बिन रह रहा हूँ
आसां नही है... "गुरुचरण" प्रेम निभाना...यकीं कीजिये
आसां नही है...तुमसे दिल लगाना...यकीं कीजिये


                                                                                  "गुरु"

Friday, 4 March 2022

बिरहा यही है (Birha Yahi Hai)...

                                                                          बिरहा यही है....


बिरहा यही है....

मैंने जो सही है...बिरहा यही है....



हमसे पूछो के ये दिन हमने कैसे सहे हैं
आँखों मे आँसू लेकर,हम कैसे रहे हैं
मौज-बहारें सब तुमसे जुड़ी हो जब
कैसा फर्क फिर हम,जिये या मरे हैं...

इंतज़ार में सब रातें कटी हैं
बिरहा यही है...बिरहा यही है...

तुम्हारे समय मे शामिल,क्यों मैं नही हूँ
प्यारा नही हूँ,,,या तुम्हारा नही हूँ
प्यारा भी हूँ गर...तुम्हारा भी हूँ गर
तुम ही कहो फिर क्या,ये दूरी सही है

तेरी दीद बिन  मेरी सांसे थमी हैं
बिरहा यही है...बिरहा यही है...

न खाना ही भाता,न पानी दिल को पचता
सब कुछ वही है, पर अच्छा नही लगता
खुश तो नही मैं, पर रहता हूँ हंसता
तुम न मिलो तो फिर,मेरे पास है क्या बचता


मन मे ललक तेरी आँखों मे छवि है
बिरहा यही है....बिरहा यही है....

                                                                   "गुरू"

Thursday, 3 March 2022

इतना सा व्यवहार है ( itna sa vavhar hai)

इतना सा व्यवहार है


 नज़र मिलाई,हाथ मिलाया

इतना सा व्यवहार है

मुँह में प्रशंसा,दिल में गाली
यही आज का शिष्टाचार है


कुछ जगत की देखा देखि,कुछ दुनियादारी का सार है
आज के सदाचार में,टीवी भी कुछ आधार है


लब-लब पर है मधुर शब्द,अंदर तीखी तेज़ कटार है
नोटों से है रिश्ते-नाते,नोटों से संसार है


प्रेम प्यार को फुर्सत कैसी,सब कुछ बस व्यपार है
नंगा ज़िस्म,नंगे नोट, देख लटकती लार है


कैसे संस्कार बने यहाँ,कैसा ये विस्तार है
फ़टे चिथड़ों में ज़िस्म जब,बिकता बिच बाज़ार है।।।।।

                                              "गुरू"

Tuesday, 1 March 2022

जो नाराज है मुझसे,वो मुझसे दूर ही अच्छे.....( Jo naraj hai mujhse....vo mujhse door hi achhe...)

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वो मुझसे दूर ही अच्छे


जो नाराज है मुझसे,वो मुझसे दूर ही अच्छे

उनकी सस्ती दवा से तो मेरे नासूर ही अच्छे

मगर इतनी समझ देना कि दोनों में फ़र्क़ समझें


अगर हीरे की ख्वाइश है तो फिर अहसास को समझो
कांच में तुम भी दिखोगे,इस विशवास को समझो
धुप में बिखर के तो चमकते कांच के टुकड़े भी है
अगर हीरे ही बने हो तो फिर जरा रात को चमको


बिना बोले जमाना सबको नया पाठ पढाता है
पैसा धुन बनाता है,जमाना साथ गाता है
कभी चाहत थी मेरी तो गरीबी मेरे साथ तुम चलती
अब मैं पैसा कमाता हूँ,मुझे हर कोई चाहता है


मैं लेकर होंसले के आँसू, लड़ा हूँ सदा खुदगर्जी से
रुलाया है बेहद मुझको,मेरी चाहत ने बेदर्दी से
मेरी हालत पर ना तुम रहम खाना मेरे मौला
मैं चाहता हूँ वो मेरे पास आये बस अपनी ही मर्जी से

अपनी ही मर्जी से.. अपनी ही मर्जी से.....        


                                                                           "गुरू" 


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Monday, 28 February 2022

तुझमे कुछ नहीं पगली मुझमे लाख खामियां है (tujhme kuchh nahi pagli mujhme lakh khamiyan hai)

                                                        खामियाँ (khamiyan)


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तुझमे कुछ नहीं पगली मुझमे लाख खामियां है

तेरा जीवन कामयाबी,मेरी किस्मत में नाकामियां है
तुम तो खामखां ही मुझसे बैठी चूं-चूं करती हो
तेरे कदमो में जो दुनियां हैं,वो मेरे ख्वाबो की दुनिया है

तोड़ दुनिया की रस्मो को मैं तुम्हे चाह तो सकता हूँ
जैसे तैसे भी हो सम्भव,मैं तुमको पा तो सकता हूँ
इस रिश्ते को चाहकर के भी मैं सम्भाल नहीं सकता
तुम समझो या ना समझो,मैं तुमको बता तो सकता हूँ

जब चलने की नही हिम्मत,पाँव की जंजीर तब टूटी
जब सबसे ज्यादा जरूरत थी,मेरी उम्मीद तब टूटी
यूँ तो किस्मत पर मुझे ,मेरी पक्का भरोसा था
पर जहाँ सबने मुझे छोड़ा,मेरी किस्मत वहां फूटी

मैं सच सच कह नहीं सकता की तुमसे प्रेम कितना है
मेरी दुनिया है उतनी सी,तेरा आगोश जितना है
तेरी आँखों में आकर अक्सर,कोई आंसू छलका होगा
तेरी दुनिया में मेरा वजूद उस आंसू के जितना है

“गुरू”

Sunday, 27 February 2022

ओह,,,, तुम हो,,,,,(oh...tum ho............)


 


ओह,,,, तुम हो,,,,,


जो जिम्मेदारी से सारा परिवार सम्भालती हो
सबसे पहले जगकर घर-बार सम्भालती हो
ओह----तो तुम हो

अपने हाथों की चाय से सबके दिन की शुरुआत करती हो
सुबह शुरू होकर रात तक काम करती हो
रसोई को ही अपना घर समझती हो
घर मे घूमने को ही पार्क की सैर समझती हो
जो रेडियो,टीवी कम और माँ-बाबूजी की आवाज ज्यादा सुनती हो------

ओह---तो तुम हो।।।


चौबीस घण्टे चौकस रहकर भी हंसती रहती है
सारा दिन व्यस्त रहकर भी 'घर मे काम ही क्या है' कहती है

जिसे टेक्नोलॉजी ओर संस्कार दोनों का ज्ञान है
जिसके लिए घर ही तीर्थधाम के समान है
माँ के साथ zee tv भी देखती है और बाबु जी के साथ सत्संग भी
जिम्मेदारी का अहसास है और बड़कपन,लड़कपन भी
जिसके पास खुद के लिए वक्त नही होता
ओह---तो तुम हो।।।।

जो सब काम करके भी डांट खाने को आशीर्वाद कहती हो
जो खुद से ज्यादा मुझे सहती है
एक दिन भी यहाँ-वहां हो तो जिसकी कमी अखरती है
जो मुझसे ज्यादा मुझे समझती है
जिसे मेरी खुशियाँ ही अपनी खुशियां लगती हैं
ओह---तो तुम हो।।।

जो टिवी का रिमोट मेरे पास जानबूझकर भूल जाती है
मेरे नहाने से पहले पानी, तौलिया, साबुन सब धर आती ही
जो मेरी पसंद के भोजन को अपनी पसंद बना बैठी
आधी रात को मेरी खातिर चुल्हा सुलगा बैठी
ओह---तो तुम हो।।।।।


सब जिससे प्यार करते हैं
मुझसे ज्यादा जिसपर विश्वास करते हैं
मुझसे ज्यादा जिसकी चिंता करते हैं
जिसके साथ रहकर मां-बाबुजी जिसका ध्यान रखते हैं

ओह---तो तुम हो।।।।।।

तुम आई तो झांझर से नींद खुली
दिल खुश हुआ कि तुम मिली
"गुरू"हुआ प्रसन्न प्रिय"ऋतु"तुमको पाकर
तुमने घर को बना दिया स्वर्ग मेरे घर आकर।।।

“गुरू”