Tuesday, 18 July 2023
आँखों में ज़हर है…
Friday, 14 July 2023
आपकी आँखों के अंदर देखें हैं…aapki aankhon ke andar dekhe hain…
दरिया संग मिलते समुंदर देखे हैं
आपकी आँखों के अंदर देखे है
हल्के गुलाब की रंगत से बना चेहरा आपका
केसर के टुकड़े घुलते,दूध के अंदर देखे हैं
सारा दिन अच्छा गया,जब एक नज़र देखा आपको
मानो मिश्री के टुकड़े खाकर दही के अंदर देखे हैं
हाए तौबा आवाज़ आपकी,अंतर्मन तक मार करे
होंठों से निकले तीर चुभते दिल के अंदर देखे हैं
चेहरे पर नागिन सी लटकी,हल्के काले बालों की लट्ट तौबा
चाँद तारों से भरे अंधेरे,मिलते सूरज के अंदर देखे हैं
दरिया संग मिलते समुंदर देखे हैं
आपकी आँखों के अंदर देखे है
Sunday, 11 June 2023
जा रहा हूँ मैं तेरा शहर छोड़कर …ja raha hu main tera sheher chhodkar
तेरी ज़हर सी ज़िंदगी में शहद घोलकर
जा रहा हूँ मैं तेरा शहर छोड़कर
शहद बनके आया था,शहद बनके रहा
ख़ुशी है मैं जब तक रहा,तेरा बनके रहा
उलझी ज़िंदगी की गाँठे खोलकर
जा रहा हूँ मैं तेरा शहर छोड़कर
मैंने तुझसे किए मेरे सारे वायदे निभाये हैं
मेरे भोले-भाले सच ने तेरे संगीन झूठ छिपाए हैं
ज़हर पिया है अपने अधर खोलकर
जा रहा हूँ मैं तेरा शहर छोड़कर
मैं ग़लत रास्तों से तुमको बचाने आया था
सालों बाद भी मोहब्बत का फ़र्ज़ निभाने आया था
तेरी दिल्लगी के आगे हाथ जोड़कर
जा रहा हूँ मैं तेरा शहर छोड़कर
असला साथ नहीं रखता,,,asla sath nahi rakhta
जीतकर कमाई है ,झूठी साख नहीं रखता
उस हसीना पर भरोसा ,मैं खाख नहीं रखता
आँखों में आई यादें दिल में उतार लेता मगर
बारूद से भरकर मैं असला,साथ नहीं रखता
चाहत उसकी जब तक साथ थी; तो थी
अब उसकी चाहत साथ नहीं रखता
उसकी याद से इतनी दूरियाँ है मेरी
उसकी छुई हुई चीजों पर भी ; मैं हाथ नहीं रखता
उसके दिल में होने का,मैं अहसास नहीं रखता
उसका होना या ना होना,मायने कुछ ख़ास नहीं रखता
दिल में कुछ,होठों में कुछ रखते हो “गुरु”
बेवफ़ा लोगों के आगे ,मैं अपनी बात नही रखता
तुम बिन नींद ही ना आये,ऐसी रात नहीं रखता
मेरी कद्र ना हो तो मैं ज़ज़्बात नहीं रखता
तेरे जाने के ग़म से टूट सा जाये
“गुरु” ऐसे भी हालात नहीं रखता
Wednesday, 31 May 2023
इस शहर में घर क्यों रखूँ,,,,is shehar me ghar kyun rakhun
ब्याह करके जब तुम ही चली गई
अब मैं इस शहर में घर क्युँ रखूँ
तेरे दिल में मेरी याद,मेरे बाद भी नहीं
मैं मेरे बच्चों के नाम,तेरे नाम पर क्युँ रखूँ
तुमने सजा ली है अलमारी में इत्र की शीशियाँ
मैं अपनी अलमारी में ज़हर क्युँ रखूँ
दूसरों के आग़ोश में गर्माहट लेने लगी हो
तेरे लिये मेरे हाथों में दोपहर क्युँ रखूँ
तुम किसी के लिए कुछ भी रहो,मेरे लिये ख़ुदा रहोगे
दिल नहीं मानता,किसी और के सज़दे में सर क्यूँ रखूँ
पहला प्यार,,,,pehla pyar
पहला प्रेम तुमसे किया,वही बन गया मोह प्रिय
कैसे नयनन से दूर करूँ,तुम्हीं कुछ कहो प्रिय
वियोग दुख मुझको ही क्यूँ,स्वीकृति तो दोनों की थी
मैं ही तन्हा क्यूँ झेलूँ,तुम भी तौला-मासा सहो प्रिय
संभावित तुम न भाग्य लिखी,जितनी मिली प्रयाप्त सखी
आजीवन मैं तेरे हृदय बसूँ,मुझमें बसकर तुम रहो प्रिय
कभी पूरी न मन की चाह हुई,भला कब कान्हा की राधा हुई
उतना प्रेम तो संभव ना है,उस से कम भी ना हो प्रिय
मेरे नाम में नाम तुम्हारा,मुझे ख़ुद से ज़्यादा तुमसे स्नेह प्रिय
देह अर्पण किसी को रखो,हृदय समर्पित”गुरु” को रखो प्रिय
प्रेम मे शर्त,,,,,prem me shart
प्रिय
मुझे तुमसे सच्ची मोहब्बत है मगर
तुम्हें मुझसे दिन भर बात करनी होगी
ताकि मैं दिल से किसी और को
भुला सकूँ….व…
तुम्हें बसा सकूँ…
तुम्हें आना होगा मेरी ज़रूरतों में काम
ताकि…कोई और ना आये
वरना मैं मोह जाऊँगी
किसी तीसरे की हो जाऊँगी…
मेरे सारे चेहरे खूबसूरत दिखाने होंगे
तारीफ़ों के झूठे पुल बनाने होंगे
मैं ग़ुस्सा करूँगी,बदसलूकी करूँगी
और तुम्हें नख़रे उठाने होंगे…
मुझसे मोहब्बत करनी होगी
इज़्ज़त करनी होगी
ये जानकर भी
कि मेरे महबूब रहे हैं कई
पर मेरी बात मानो तो सही
अब वाला जो दिल में बसा है
वही है आख़िरी…..
ये सब कर सकते हो
तो मेरे दिल में रह सकते हो…
अपना कह सकते हो….
सुनो मेरी प्रिय सखी
मैंने तुमसे प्यार किया है
चौकीदारी नहीं
यूँ दिल से कितनों को निकालूँगा
अपनी तस्वीर तुम्हारे दिल में
कितनी बार डालूँगा…
अगर सच में मोहब्बत है
तो…….
ये तुमको ही करके दिखाना होगा
दिल में मुझे बसाना होगा…
वरना दुनिया भरी पड़ी है
दिल को भरती रहो
शौंक पूरे करती रहो…
मैं पुराना आशिक़ हूँ….
तुम्हारे सिवा
दिल में भला किसे बनाऊँगा
मन मारकर चला जाऊँगा
आज हूँ….साथ तो हूँ….
कल नज़र नहीं आऊँगा….
लेकिन….अपने साथ ले जाऊँगा
तुम्हें मुझे चाहने का अधिकार
वो इंतज़ार
जो छत पर मैंने तुम्हारे लिए
कई साल किया है
वो एक जन्म
जो तुम्हारे साथ जिया है
वो नज़र जो तुम्हें देखकर
ठहर जाता करती है
वो मीठी आवाज़
जो तुम्हारे साथ
दिन-रात बात किया करती है
वो हक़
जिस से तुम कभी भी
मुझे फ़ोन कर सकती हो
ग़ुस्सा कर सकती हो…
लड सकती हो….
झगड़ सकती हो….
बिना पलक झपकायें
मेरी आँखों में झांकने का
हक़…..मुझसे मुझे माँगने का
अब मैं सही रास्ता नहीं दिखाऊँगा
बातें नहीं समझाऊँगा
ज़रूरत हो या आपातकाल
मैं काम नहीं आऊँगा
मुँह मोड़ लूँगा
सारे बंधन तोड़ लूँगा
मेरा प्रेम अमर रखूँगा
तुम्हें अधर में छोड़ दूँगा
रहा फ़ैसला तुमपर
रहो,रचो,बसो
किसी के दिल में
किसी के घर में
किसी के बिस्तर पर
और समझाना दुनिया को
कि तुमने कुछ नहीं किया
अगर कोई माने….तो ……
अगर आओ मेरे पास
मेरी बनकर पूरी आना
अधूरी
मुझे स्वीकार नहीं …..
मुझे तुमसे मोह और मोहब्बत
दोनों बेपनाह
है
मगर
इस मोहब्बत में तुम्हारी
शर्तें स्वीकार नहीं….
“गुरु” का प्यार…..प्यार है
कोई बातों का बाज़ार नहीं
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हम उनके दोगलेपन के बारे में क्या जान गए वो तो बुरा ही मान गए पीठ पीछे करते रहे ,मारने की साज़िश सामने देखा तो हमारी लंबी उम्र पर क़ुर्बान ...
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बदलता है जब भी मौसम,तुम्हारी याद आती है धूप से शाम होती है ,तुम्हारी याद आती है ऐब दो पाल रखे हैं , एक तुम और एक तुम्हारे रंग की चाय चा...
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ओह,,,, तुम हो,,,,, जो जिम्मेदारी से सारा परिवार सम्भालती हो सबसे पहले जगकर घर-बार सम्भालती हो ओह----तो तुम हो अपने हाथों की चाय से सबके दि...