Tuesday, 30 June 2026

बुरा ही मान गए…

 हम उनके दोगलेपन के बारे में क्या जान गए

वो तो बुरा ही मान गए


पीठ पीछे करते रहे ,मारने की साज़िश

सामने देखा तो हमारी लंबी उम्र पर क़ुर्बान गए


हमारी गलती होती तो नज़रें झुकाकर माँगते माफ़ी

तुमने गलती की ,फिर सीना भी तान गए


साथ हमारे बिताए समय को नज़रअंदाज़ किया

दूसरों ने कान भरे,और तुम सच मान गए


दिल में बसाकर उनके लिए क्या -क्या करता रहा ख़ुदा 

उनकी बारी आई तो उठाकर सामान गए 


नादानियाँ नज़रअंदाज़ करने को काला चश्मा पहना था 

तुम तो ग़ालिब,हमे अंधा ही मान गए 


कुछ देर म्यार में आराम करने को क्या उतरा "गुरु"

वो तलवार की धार को कम जान गए

Saturday, 27 June 2026

आँखों ही आँखों में ..

 चाय की प्याली हाथों में ले, मुंडेर पर रुक जाता हूँ मैं,

आँखों ही आँखों में अक्सर, तेरी छत तक आ जाता हूँ मैं।


बंद आँखों से भी तुझको, उस छत पर हँसते देखता हूँ,

मानो नयन मिले हों तुमसे, यूँ ही मुस्कान बिखेरता हूँ।

यादों के कुछ गीत चलाकर, संग तुम्हारे गुनगुनाता हूँ मैं


आँखों ही आँखों में अक्सर, तेरी छत तक आ जाता हूँ मैं।


जब ढलती है शाम शहर में, और आसमां में चाँद आता है,

तेरी छत का वो सूनापन, मेरी धड़कन को महका जाता है।

हवा के हर एक झोंके में, तेरी आहट सुन मुस्काता हूँ मैं


आँखों ही आँखों में अक्सर, तेरी छत तक आ जाता हूँ मैं।


सालों बीते बिछड़े हमसे, पर अब भी तुमसे खूब बनती है,

इस एकतरफा मोहब्बत की, यारा अपनी ही मर्ज़ी चलती है।

तन्हा होकर भी 'गुरु' हर पल, तेरा साथ निभाता हूँ मैं,


आँखों ही आँखों में अक्सर, तेरी छत तक आ जाता हूँ मैं।

Sunday, 19 April 2026

ज़ख़्म हरा नहीं..

 ग़लत फ़हमी है की ज़ख़्म अब हरा नहीं 

37 बरस का हो गया, पर ज़ख़्म भरा नहीं 


मैंने तुम्हें ग़ैरों के गले मिलते देखा है 

शुक्र करो,किसी का गला कटा नहीं 


आपस में कई बरस छिप के दुख बाँटे तुमने

मुझसे न कोई मिला,मेरा दुख बँटा नहीं 


बद-दुआओं को सीने में दफ़्न रखा है मैंने 

ख़ुशी है , दोनों में से कोई मरा नहीं 


तेरे घर-गली मोहल्ले से मेरा रोज़ गुज़र रहा 

लिहाज़ रखा सबका,किसी से डरा नहीं 


तुम तो सबको झूठी कहानी बता साफ़ हो बैठी 

सच छिपा है मुझमें, जो किसी को पता नहीं


“गुरु “

Monday, 23 March 2026

वही भगत फिर चाहिए

 आँखो में अंगार वही,सीने में वही दहक फिर चाहिए 

वही सुखदेव,वही राजगुरु,वही भगत फिर चाहिए 


गौरों से पिछा छुड़ाया तो अपने ही छाती पर चढ़ बैठे 

अपने कालों को भी अब गौरों सा सबक फिर चाहिए

वही सुखदेव,वही राजगुरु,वही भगत फिर चाहिए 



शिष्टाचार की भाषा अब सबकी समझ से है परे 

वही कलम,वही बंदूक वही सनक फिर चाहिए 

वही सुखदेव,वही राजगुरु,वही भगत फिर चाहिए 


मूछों पर ताव अब तुमको सलामी है “गुरु “की 

तेरी-मेरी मेहनत का बराबर हक़ अब चाहिए 

वही सुखदेव,वही राजगुरु, वही भगत फिर चाहिए

Wednesday, 18 March 2026

तुम्हारे पास आ चुप-चाप लबों को चूमना था बस..।।

 

तेरी सोहबत मे बैठकर, जरा सा झूमना था बस

ले हाथ मे चाय, तुम्हारे साथ छत पर घूमना था बस

होती रात और तुम बगल मे मेरे चाँद बन सोते

तुम्हारे पास आ चुप-चाप लबों को चूमना था बस

 

ठंडी सी हवा चलती, होती रोशनी हल्की सी

बंद पलकें तुम्हारी मोटी-मोटी आँखों को ढके रखती

हो माथे-गाल से बालों की लट होंठों तलक उड़ती

उड़ते बालों को उंगलियों से झुमके के पीछे लपेटना था बस

तुम्हारे पास आ चुप-चाप लबों को चूमना था बस

 

करवट ले भी ली मैंने पर तुम्हारे फूले गाल नहीं भूला

कस्तूरी,चंदन भूल गया पर तुमसे उड़ता गुलाल नहीं भूला

सन्नाटे मे भी मुझको मेरी साँसे मानो शोर सुनाई दी

गहरी सांस लेकर मन ही मन तुम्हें सूंघना था बस

तुम्हारे पास आ चुप-चाप लबों को चूमना था बस

 

बिछड़ी भी तो ऐसी कि सपन तक मे दिखाई न दी

न मिले कभी गले,न साथ मे तस्वीर कभी कोई ली

बिछड़ने की खबर होती तो एक-एक ख्वाब मुकम्मल करते

अरसा ऐसा गुजरा की तुम्हारी आवाज तक न सुनाई दी

हो बेपरवाह भारी आँखों से तुमसे जी भरकर लिपटना था बस

तुम्हारे पास आ चुप-चाप लबों को चूमना था बस

 

 "गुरु"

 

Saturday, 7 March 2026

बाख़ुदा तुम्हारे सिवा इश्क़ , किसी से नहीं किया

 बाख़ुदा तुम्हारे सिवा इश्क़ , किसी से नहीं किया 

इतिहास रहेगा, जब तक जिया, तुम्हारा बनके जिया 


तुम्हारे साथ बैठकर जो की, बस वही बातें थीं

याद  में जगकर जो काटीं, बस वही रातें थीं।

किसी के साथ 'चाय' का ज़ायका नहीं चखा हमने

जबरन कप उठा भी लिया, तो मानो अहसान किया 

बाख़ुदा तुम्हारे सिवा इश्क़, किसी से नहीं किया।


हमने खेली थी जो संग तुम्हारे, बस वही होली और फाग था

उसके बाद से तो इस कलेजे में, जलता विरह का आग था।

तुम्हारे सिवा किसी और को रंगा नहीं, ना तब और ना अब

ज़रूरी हुआ तो रंग बस हथेली पर बे-जान सा धर दिया।

बाख़ुदा तुम्हारे सिवा इश्क़, किसी से नहीं किया।


हर शाम सूखी नज़रों से तुम्हारा इंतेज़ार करतें हैं 
अकेले बैठते हैं,आँखें बंद करके संगीत सुनते हैं 
दिन रात दोपहर सबमे बाँट दिए “गुरु” ने 
शाम का पहर तुम्हारा था,आज भी किसी के नाम नहीं किया 
बाख़ुदा तुम्हारे सिवा इश्क़ , किसी से नहीं किया

Friday, 10 October 2025

राम जाणे, के आगे आवै सै

बाबू ये काम जनाने पण के,मनै भी क़द भावै सै 

के पाप करे थे राम जाणे, के आगे आवै सै 


लत्ते धोण की खातर कद मेरा जी मानै सै 

कासण माँजदे होयाँ कै बीते,मेरा जी जाणे सै 

छाती ऊपर मेरे भी सौ साँप लोटणी खावै सै 

के पाप करे थे राम जाणे, के आगे आवै सै 


आटा गूँथणा ,रोट बनाने मने कद चाये थे 

थारी अर मेरी रोटी खातर खूब धक्के खाये थे 

हालत पै अपणी भी मनै रोणा सा आवै सै 

के पाप करे थे राम जाणे, के आगे आवै सै 


मैंने बेरा सै यू सब देखके तेरा भी जी दुखे सै 

माँ की भी भीतर ए भीतर आत्मा सी फूँके सै 

सोच के टैम काटूँ अक बख्त बुरा सबपै ए आवै सै 

के पाप करे थे राम जाणे, के आगे आवै सै 


समझूँ तो मैं भी सब सूँ,सारे सच जाणु सूँ 

रोल्या यो सै अक घर भीतर रोल्या ना चाहूँ सूँ 

ख़ुद जल ल्यूँ,मर ल्यूँ पर किसे तई कहण पै के हो जा सै 

के पाप करे थे राम जाणे, के आगे आवै सै 


मने कही थी बापू,मत ब्याह मनै ,मैं एकला मर-खप ल्यूंगा 

रहूँ जिस्या रह ल्यूँगा ,किसे नै दुख तो नहीं देऊँगा 

इब जीते जी यो लाल तेरा रोज़ चिता ज्यूँ बले जा सै 

के पाप करे थे राम जाणे, के आगे आवै सै 


मेरी सासू न्यूँ कर मनै चोखी तरियाँ बालक नुहाणे सिखादे 

कपड़े,भांडे,रोटी आगी, इब सब्ज़ी बनानी और सिखादे 

काल कोये न्यू ना कहदे अक लुगाई नै तड़पा है 

के पाप करे थे राम जाणे, के आगे आवै सै


रोटी-टूका खातर कद लग सरकार घर झुड़वावेगी 

सारे काम कराए इब के फाँसी तुड़वावेगी 

परिवार व्यपार समाज़ सारे क्यों एक ही पलड़े आवै सै 

के पाप करे थे राम जाणे, के आगे आवै सै

Sunday, 31 August 2025

तौबा फँसे हुए…

 हैं बुरे से दौर में तौबा फँसे हुए 

सालों हुए हैं तौबा खुलकर हँसे हुए 


हाथों को हाथ देकर बाहर निकालिए 

कब तक रहेंगे तौबा खड्डे में धंसे हुए 


किस से उम्मीद किज़िये सुनेगा हमे यहाँ

सबके सब पड़े है गुस्से में तपे हुए 


ख़ुद में रहकर ख़ुदको मसीहा ना समझो 

किसी रोज़ देखोगे ख़ुद को रास्ते पर पड़े हुए 


अपनी अपनी छोड़कर अब सबकी सोचिए  

कब तक रहेंगे दोनों “गुरु” कीचड़ में धंसे हुए 

Thursday, 26 June 2025

तुम्हारी याद आती है,,,,,

 बदलता है जब भी मौसम,तुम्हारी याद आती है 

धूप से शाम होती है ,तुम्हारी याद आती है 


ऐब दो पाल रखे हैं , एक तुम और एक तुम्हारे रंग की चाय 

चाय को समझकर जाम पीता हूँ ,तुम्हारी याद आती है 


जाकर बैठ गए तुम दूर,दिल के भेद कहूँ किस से 

आधी रात सताए याद तो बात करूँ किस से 

छाती रख सिरहाना जब आराम लेता हूँ,तुम्हारी याद आती है 


रात को सोए-सोए ही बिस्तर पे तुम्हें हाथों से ढूँढना 

जागकर नींद से तुमको तुम्हारी खैरियत पूछना 

आदत हो बुरी बेशक मगर दिल को लुभाती है

रात से भौर होती है,तुम्हारी याद आती है


मुकरर दिन से पहले मायके से लौट आओ तो ये मानू 

आते ही करो बंद दरवाजे,गले लग जाओ तो ये मानु 

जितनी मुझको आती है उतनी ही तुम्हें भी याद आती है 

तुम्हारी याद आती है,तुम्हारी याद आती है,,,,,,

Tuesday, 10 June 2025

रिश्ते बने रहे ।।

 

माँ ने सालों तक कपड़े धोए

तह किए,प्रेस किए

रख दिए,पहनने के लिए दिए

कभी जेब नहीं टटोली

धुल न जाए जरूरी कागज़ कोई  

इसलिए जेब मे हाथ भी डाला

कागज़ निकाला

और बिना खोले लौटा दिया

उसी को

जिसकी जेब से निकला था

 

राज बने रहे,रिश्ते बने रहे

माँ बनी रही माँ

जासूस नहीं बनी

 

अक्सर मेरे कमरे का दरवाजा रहा बंद

मैं अकेला कमरे मे रहा नजरबंद

पिता कभी अंदर नहीं आए

जरूरत पड़ी तो मुझे बुलाया

काम बताया,वापस भेज दिया

घर हमेशा उनका रहा

पर कमरा उन्होंने मेरा बनाए रखा

कभी-कभार मेरे बारे मे पूछताछ की

पर कभी खामियाँ जाहीर नहीं की

राज बने रहे,रिश्ते बने रहे

पिता-पिता रहे

जासूस नहीं बने

 

लगभग हम-उमर रहा बड़ा भाई

मेरी ही उम्र से ताज़ा-ताज़ा निकला

मेरे ज्यादातर दोस्त, भाई के भी दोस्त थे

सब जानता था

अच्छे से मुझे पहचानता था

एक घर मे रहते हैं

शायद पढे हो छिप-छिपकर

मैंने उसके और उसने मेरे

प्रेमपत्र

पर बावजूद इसके

बड़ा भाई पिता और

छोटा पुत्र बने रहा

एक दूसरे का

सच जानकर

यही बेहतर मानकर

राज छिपे रहे

राज बने रहे,रिश्ते बने रहे

भाई बना रहा भाई

जासूस नहीं बना

 

बड़ी बहन सोचती है दूर तलक

बैठाकर रखा उसने भी अपनी पलक

छोटे थे तो पहन लेते थे एक दूसरे के कपड़े

पर अब नहीं छूते एक दूसरे की अलमारी भी

हालांकि है दोनों को एक दूसरे की जानकारी भी

पर ;

अनजान रहे ताकि

दोनों का सम्मान रहे

राज बने रहे , रिश्ते बने रहे

बहन बनी रही बहन

जासूस नहीं बनी

 

कुछ कमीनों के झुंड से तो कुछ भी छिपा नहीं

हर कांड मे वो साथ थे,छिपाने को कुछ रहा भी नहीं

शराब-शबाब,नशा-खुदा, लत-बरकत-शौहरत

सब उनके साथ ही पाई

कभी कोई बात नहीं छिपाई

एक फोन पर मिलने चले आने

वाले दोस्तों ने भी

कभी नहीं छुआ,एक दूसरे का फोन

किसी तस्वीर या मेसेज पर नहीं पूछा :ये कौन?

एक दूसरे से दस-बीस रुपये के लिए झगड़ने पर भी

किसी ने किसी की जेब मे हाथ नहीं डाला

पर्स नहीं छुआ

राज़ बने रहे ,रिश्ते बने रहे

दोस्त बने रहे दोस्त

जासूस नहीं बने   

 

'गुरु' रिश्ते मे जरूरी है 

अपनी ही एक जगह 

ताकि बनी रहे गरिमा 

ताकि रिश्ते बने रहे

प्रेम बना रहे 

प्रेमी बने ;जासूस नहीं ।



 'गुरु"

 

 

Sunday, 5 January 2025

दंड-विधान

 दंड-विधान 

मुझे समझना है वह दंड विधान 

जो मेरे गलती करने पर 

बनाता है मुझे पापी 

और 

तुम्हें महान 


एक बंधन मे बंधे हम दोनों 

बराबर थे 

दोनों ही एक धरा पर थे 

फिर एक रोज

हुई मुझसे गलती ;और हमारा रिश्ता 

बन गया तुमपर बोझ ?


चलो मुझसे गलती हुई 

बना गया मैं अपराधी 

पर ;मुझे सजा देने की 

तुम्हें किसने  दी आजादी  ???


अस्वीकार्य है वो दंड विधान 

जो सजाएँ बांटता हो 

लिंग-भेद के अनुसार 

रिश्तों के अनुसार 

कमाई के अनुसार 

जरूरत के अनुसार 


गलती एक 

पर पुरुष और नारी को सजा मे भेद 

रिश्ता वही ;मेरी गलती तो गलती 

तुम करो तो वही सही 

क्या खुद को सही साबित कर पाते ?

क्या इन गलतियों पर सबको वही सजा दे पाते ?

मा-पिता को भी ;भाई  बहन को भी???

अगर उनसे भी यही 

या शायद इस से भी बड़ी गलती हुई होती 

या 

शायद हुई भी होगी..।।।

पर......  तुमने छिपा ली होगी 

और बात जब  मुझपर आई तो 

तुम करने लगे इंसाफ 

भूल गए सबके अपराध 

थोप दी मुझपर सारी सजा 

बन गए मेरे खुदा 


ये कैसा इंसाफ है 

तुम ज्यादा कमाते हो 

तो तुम्हें सब माफ है 

एक को सब सजा दी जाएगी 

दूसरे की जरूरत है तो गलती भूला दी जाएगी ?


समझाओ मुझे वो सामाजिक संविधान 

जिसमे अपराध और गलती 

दोनों ही  एक समान

तुमसे गलती हुई 

तुम माफ हुए 

मुझे गलती हुई तो मानो 

गलती नहीं पाप हुए 

लाओ जरा संज्ञान मे 

पैमाना आँकने का क्या है इस दंड विधान मे 


दवा और नशा 

श्रेया और प्रेया 

आलिंगन और आकर्षण 

चाहत और जरूरत 

अपशब्द किन्तु  अपनापन 

समझाओ दोनों मे अपराध क्या है और गलती क्या ?


ये कैसा विधान है 

जो हर हल पर प्रश्न खडा कर देता है 

केवल सजाओं के लिए गलतियों को  

छोटा और बड़ा कर देता है 


बकरी चोरी छोटी,पैसा चोरी अपराध बड़ा 

क्यूँ  गाली देना गलती छोटी,क्यूँ चरित्र हनन अपराध बड़ा 

क्यूँ तन पर घाव छोटे और मन पर घाव आघात बड़ा  

क्यूँ माफी छोटी, क्यूँ इंसाफ बड़ा

क्यूँ माफी छोटी-------क्यूँ इंसाफ बड़ा  


लंबा रस्ता तय करना है 

इस दंड विधान को एक तरफ रखना होगा 

और महत्व देना होगा 

इंसाफ से बढ़कर माफी को 

बीति जिंदगी भुलकर बाकी को 

प्रेम मे तुम्हें समर्पित हूँ 

ऐसा झूठा दंड विधान मेरा हकदार नहीं 

मतभेद मुझे स्वीकृत है 

मनभेद किंचित भी स्वीकार नहीं …

    

                                                         'गुरु'*


Saturday, 24 August 2024

तेरे घर की छत को देख लिया

 

तेरे घर की छत को देख लिया

महीनों बाद लिखना शुरु किया

 

हम तो चाय छोड़ चुके थे

तुम्हें सोच के फिर बिस्मिल्लाह किया

 

तुमने तो बातें करनी छोड़ ही दी हैं

हमने भी अब आशा करना छोड़ दिया

 

तुमने ऐसी आस तोड़ी  है

"गुरु" छत पर जाना लगभग छोड़ दिया


"गुरु"

 

 

 

 

Saturday, 6 April 2024

चाहते हैं तेरे जैसा होना…!!

 छोड़ गुरु दुनिया के ख़यालात पर हैरान होना 

ये बुरा भी कहते हैं और चाहते हैं तेरे जैसा होना 


सच्ची मोहब्बत बोलकर जान लूटने वाले आशिक़

चाहत सबकी ही वही है; साथ हमबिस्तर होना 


साफ़-साफ़ पूछोगे तो मुकर जाएँगे सबके महबूब 

हवस को मोहब्बत कह दो;शुरू कर दो साथ सोना 


हम साफ़ कहते हैं,चाहत हवस की थी,हवस की है 

“गुरु” के बस में नहीं साल भर बोलना बाबू-शौना

Thursday, 1 February 2024

हाँ…मैं चाय पीता हूँ

 हाँ…मैं चाय पीता हूँ…..


मैं शराब पियूँगा तो 

तुम बदनाम हो जाओगी

जीतने झूठ बोल लूँ दुनियाँ को 

कारण तुम ही बताई जाओगी


जैसे-तैसे गम पिता हूँ 

हाँ…मैं चाय पीता हूँ…..


तुम्हें सोचने से जो सर दर्द होता है 

उसकी कोई और दवा हो तो बताओ

सिगरेट पियूँगा तो ज़्यादा खलूँगा तुम्हें

बेहतर है; चाय पीने से मत हटाओ


तुम्हें सोचकर जी लेता हूँ

मैं चाय पीता हूँ…..


गरम चाय का कप जब हाथ लेता हूँ

मानो तुम्हें भी अपने साथ लेता हूँ

आँखें मूँदकर ;पहले नशे सा सूंघकर

होंठों से लगा लेता हूँ


सिप-सिप करके पिता हूँ

हाँ…मैं चाय पीता हूँ…..


पिता हूँ तो पिता हूँ बस

ख़ाली कप भी ख़ाली कहाँ भाता है 

मैं चाय को हाँ कह देता हूँ…

जब कोई भी पूछने आता है 



कभी-कभार दो कप भी पी लेता हूँ

किसी और के कप में नहीं पीता हूँ

चाय के रंग से मिलते-जुलते 

कई कप सँभाल रखे हैं मैंने

रोज़ बदल कर पिता हूँ

हाँ…मैं चाय पीता हूँ…..


कप लेकर छत पर आ जाता हूँ

आँखें बंद करता हूँ; सामने तुमको पाता हूँ

सॉफ्ट-सॉफ्ट से धौखे भरे से 

तेरी याद में गीत बजाता हूँ…

साथ में गुन-गुनाता हूँ…


ऊधड़े सपनों को सीता हूँ

हाँ…मैं चाय पीता हूँ…..

Thursday, 25 January 2024

चाय….

दिल तेज़ाब बन बैठा 

पर पी तेरी याद में चाय 

रात भर नींद ना आई 

डॉक्टर ने वजह बताई चाय


तेरी तस्वीर छिपाने को 

मोबाइल सम्भाल रखा है 

पासवर्ड नाम है तेरा 

वॉलपेपर भाँप भरी चाय


तेरी आँखों में डूबे इस कदर

चश्मे लगे, सर दर्द बताया ना जाए

दिल में बेचैनी,कमी आई सुकून में 

डॉक्टर ने दवा बताई तीन वक्त चाय 


तुम हो सामने और ठंड बहुत हो 

होंठ काँपे कुछ कहा ना जाये 

मनपसंद शख़्स और गर्मा-गर्म चाय 

“गुरु” कम है जीतने भी मिल जाये


“गुरू”

Wednesday, 20 December 2023

तेरी दी निशानी,मुसीबत तुमसे भी बड़ी

 तेरी दी निशानी,मुसीबत तुमसे भी बड़ी 

हाथों से निकाली, तो गले में आ पड़ी 


मुझे अब तक याद है गहरी सी आँखें तेरी 

छोटे-छोटे होंठ,आँखों की भौंहें चढ़ी-चढ़ी


“गुरु” हुए दूर तो जीते जी मर जाऊँगी

सालों पहले किया करती थी बातें बड़ी-बड़ी


तेरी यादों को साथ में बांध रखा है ना चाहकर भी

चाँदी की अंगूठी दी थी तुमने,मैंने बना ली हथकड़ी


तेरे ज़हन में फिर भी फीकी पड़ गई मेरी यादें

सोने सी चमकती निशानी तेरी अब भी मेरे गले में लटकी पड़ी

Friday, 17 November 2023

अपनी छत पे आया करो…

  देखने मुझे,अपनी छत पे आया करो

ढूँढो मुझे,मेरा नाम चिल्लाया करो


तुम ऐसा करो,मुझे बदनाम कर दो 

बहुत कह लिया,अब करके दिखाया करो


जेब,फ़ोन,दिल,दिमाग़ सब टटोल ली

शक न मिटे तो जासूसी भी करवाया करो


मेरी माशूक़ बनकर मरना,तेरी क़िस्मत में कहाँ

तुम तो बस मुझे आज़माया करो


आज तक “गुरु” ने कहीं तेरा नाम लिया है भला?

तुम निस्संकोच मुझपे आगे भी दाग लगाया करो

Thursday, 14 September 2023

अय्याश बनाने वाले तुम…

 तेरी क़िस्मत में पक्के थे हम

हमे काश बनाने वाले तुम

तेरे भोले-भाले आशिक़ थे हम

आशिक़ से अय्याश बनाने वाले तुम 


सामने बैठकर आज तलक भी 

हमे समझ कहाँ कोई पाया था 

शतरंज के वज़ीर-बादशाह हम थे 

हमे गड्डी वाले ताश बनाने वाले तुम

तेरे भोले-भाले आशिक़ थे हम

आशिक़ से अय्याश बनाने वाले तुम 


बरसाती अंबर के अंदर तारे गिनना बंद करो

अब मेरी महबूबाओं की गिनती गिनना बंद करो 

ख़ुद चाहो जो मर्ज़ी कहदो तुम मुझसे 

मन ही मन के अंदर मुझको सुनना बंद करो

चाँद सा बनकर पल-पल तुमसे बतियाता था 

आवारा आकाश बनाने वाले तुम 

तेरे भोले-भाले आशिक़ थे हम

आशिक़ से अय्याश बनाने वाले तुम 


तड़प-तड़प कर जी लेंगे

होगा इस से ज्यादा क्या 

मन में लेकर मैल मिलो तुम

इस मिलन का फ़ायदा क्या

“गुरु”जीता जागता सपना था 

मुझे लाश बनाने वाले तुम,….

तेरे भोले-भाले आशिक़ थे हम

आशिक़ से अय्याश बनाने वाले तुम

Thursday, 10 August 2023

हर ग़ज़ल तेरी याद है….

ग़ज़ल में छिपी एक बात है 
हर ग़ज़ल तेरी याद है 

आँसू से भरे मेरे महखाने
तुझसे ही आबाद है 

दूर होकर रोना कैसा 
अब तो तूँ आज़ाद है 

सबसे अज़ीज़ हसरत मेरी 
गिनती में वो भी तेरे बाद है 

हर एक ग़ज़ल में दर्द लिखा है 
लफ़्ज़ तेरे,मेरा हाथ है 

उस से होगा रिश्ता तेरा 
“गुरु” से तो जज़्बात है…

Friday, 4 August 2023

ये मेरे किस काम की….

श्लोक,बाईबल,ग्रंथ, किताबें क़ुरान की

इनमें तुम नहीं तो ये मेरे किस काम की


ये गाँजा,अफ़ीम,पोस्त,ये भाँग-ए-शराब

मुझे बहुत है ज़ाम-ए-चुस्की तेरे नाम की 


चंदा,सितारे,दौलत , मुबारक तुम्हें 

तूँ-मैं और एक चाय,इतनी सी कीमत मेरी शाम की 


तेरी झूठी मोहब्बत तुमको मुबारक पुराने महबूब मेरे 

“गुरु“को नहीं चाहिए मोहब्बत हराम की….